Monday, June 23, 2014

ईश्वर साकार क्यों नहीं?

| ओ३म् |

वैदिक सिद्धांतो पर आधारित

"दो मित्रो की बातें" - पंडित सिद्ध गोपाल कविरत्न

ईश्वर साकार क्यों नहीं?



कमल - मित्र, कल के प्रश्न का उत्तर दो ।


विमल - तुम्हारा कल का प्रश्न था कि ईश्वर को साकार माना जाय तो क्या दोष है? अच्छा सुनो! ईश्वर को साकार मानने में एक दोष नहीं अनेकों दोष हैं । देखो, ईश्वर का लक्षण सच्चिदानंद है । इसमे तीन पद है- सत्, चित् और आनन्द । सत् का अर्थ है भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनों कालों में एक रस रहने वाला दूसरे शब्दों में जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन न हो सके यह सत् है । ज्ञान वाले को 'चित्' कहते हैं और तीनों कालों में दुख के नितान्त अभाव का नाम 'आनन्द' है। ईश्वर सच्चिदानन्द इसलिए है कि उसमें परिवर्तन कभी नहीं होता । उसका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता और न कभी उसमें दुःख व्याप्त होता है । संसार के जितने भी साकार पदार्थ हैं, उन सब में परिवर्तन होता है । इसलिए वह 'सत्' नहीं। 'चित्' तो केवल आत्मा अथवा परमात्मा ही है, जो कि निराकार है। कोई भी साकार या शरीरधारी दुख से बच नहीं सकता । तीनों काल इसमें आनन्द नहीं रह सकता । सर्दी-गर्मी भूख-प्यास, भय, शोक, रोग, बुढापा, मृत्यु आदि प्रत्येक साकार या शरीरधारी को सताते हैं । ईश्वर इन दोनों से सर्वथा अलग है । अत: ईश्वर को साकार मानने में पहला दोष यह आता है कि वह 'सच्चिदानन्द' और 'निर्विकार' नहीं रहता । क्योकि प्रत्येक साकार पदार्थ में जन्म, वृद्धि, क्षय, जरा, मृत्यु आदि विकार मौजूद हैं । दूसरा दोष साकार मानने में यह है- ईश्वर 'सर्वव्यापक' नहीं रहता । क्योंकि प्रत्येक साकार पदार्थ एकदेशी अर्थात एक जगह रहने वाला होता है । तीसरा दोष यह आता है ईश्वर 'अनादि' और 'अनन्त' नहीं रहता क्योंकि प्रत्येक साकार या शक्ल वाला पदार्थ उत्पन्न होता है इसलिए उसका आदि होता है, वह अनादि नहीं होता है, और न अनन्त होता है जिसका आदि है उसका अन्त अवश्य है और जो उत्पन्न होगा वह नष्ट अवश्य होगा । जिसका एक किनारा है उसका दूसरा किनारा होता ही है । चौथा दोष यह आता है - ईश्वर सर्वज्ञ नहीं रहता । क्योकि जब आकार होया   तो एक जगह होगा, सब जगह नहीं । जब सब जगह नहीं होगा तो सब जगह का ज्ञान भी नहींहोगा। एक जगह का होगा। फलत: ईश्वर 'अन्तर्यामी' भी न रहेगा,क्योकि वह प्रत्येक के मन की बात नहीं जान सकेगा । पाँचवा यह आता है ईश्वर नित्य नहीं रहता है अनित्य हो जाता है । नित्य उसे कहते है कि पदार्थ हो परन्तु उसका कारण कोई न हो । वह किसी के मेल से बना हुआ न हो साकार पदार्थ तत्वों के मेल से बना हुआ होता है। छठा दोष यह आता है- परमात्मा, सर्वाधार नहीं रहता 'पराधार' हो जाता है । परमात्मा 'सर्वाधार' इसलिए है कि सारा संसार उसी के सहारे चल रहा है । सारे ब्रह्माण्ड को उसी ने धारण जिया है । यदि परमात्मा को साकार माना जाये, तो वह किसी न किसी के सहारे रहेगा। यही कारण है कि मतवादियों ने ईश्वर को साकार मानकर उसके स्थान नियत किये है । किसी ने सातवाँ आसमान, किसी ने चौथा आसमान, किसी ने क्षीर सागर, किसी ने गोलोक, किसी ने बैकुंठलोक आदि स्थान उसके रहने के बतलाये हैं । जिस परमात्मा के आधार पर सारा जगत् है, लोगो ने उसे साकार मानकर जगत् को उसका आधार बना दिया । जब परमात्मा ही जगत् के सहारे हो जाया तो फिर जगत् किसके सहारे रहेगा? इसी प्रकार और भी बहुत से दोष साकार मानने में आते हैं ।



कमल - विद्वानों का मत है कि ईश्वर निराकार तो है, परन्तु समय-२ पर अवतार धारण कर साकार हो जाता है । जैसे भाप निराकार है लेकिन समय पर जम कर बादल या बर्फ बन जाती है । 'अग्नि' सर्वव्यापक है, निराकार है परन्तु समय पर स्थूल रुप में प्रकट हो जाता है ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते है | जब संसार का भौतिक पदार्थ निराकार से साकार हो जाते है तो परमात्मा निराकार से साकार क्यों नहीं हो सकता?

विमल - भाप और अग्नि का जो उदाहरण तुमने दिया है वह ठीक प्रतीत नहीं होता | ज़रा गहराई से सोचो | 'भाप' और 'अग्नि' एक पदार्थ नहीं है, किन्तु अनेक परमाणुओ के समुदाय है, जल के असंख्य छोटे-छोटे परमाणु भाप बन जाते है, वे ही परमाणु पुन: स्थूल होकर बादल, बर्फ और जल का रूप धारण कर लेते है | भाप यदि केवल एक ही परमाणु होती और एक रस होती तो वह कभी स्थूल नहीं हो सकती थी | यही 'अग्नि' के परमाणुओ कि अवस्था है, वे अनेक होने के कारण वे परस्पर में मिल कर स्थूल हो जाते है, और अग्नि का प्रचंड रूप धारण कर लेते है| यह कहना कि अग्नि सर्वव्यापक और निराकार है, भयंकर भूल है | 'अग्नि' पृथ्वी और जल से सूक्ष्म है इसलिए पृथ्वी और जल में तो व्यापक मानी जा सकती है, परन्तु आकाश और वायु में नहीं | हाँ आकाश और वायु यह दोनों ही अग्नि में व्यापक है क्योंकि यह दोनों अग्नि से सूक्ष्म है | सूक्ष्म पदार्थ स्थूल में व्यापक होता है | जिन-२ पदार्थो में अग्नि व्यापक है,वे सब पदार्थ रूप वाले है | संसार में जो भी रूप नजर आता है वह अग्नि कि व्यापकता के कारण है| क्योंकि अग्नि का गुण ही रूप है| अतएव सिद्ध हुआ - भौतिक पदार्थ सूक्ष्म से स्थूल और स्थूल से सूक्ष्म इसलिए हो जाते है, कि वे अनेक परमाणुओ से मिलकर बने हुए होते है | परमात्मा सर्वव्यापक, एक और एक रस है | अत: वह निराकार से साकार नहीं हो सकता| रहा यह प्रश्न कि ईश्वर समय-२ पर अवतार धारण करता है | यह सिवाय कोरी कल्पना के और कुछ नहीं है | देखो! अवतार शब्द का अर्थ है - 'उतरना' अथवा जिसमे उतरे | उतरने और चढ़ने का व्यवहार एकदेशी अर्थात एक स्थान पर रहने वाले पदार्थ में हो सकता है 'सर्वव्यापक' में नहीं हो सकता | सर्वव्यापक का आना-जाना, चढ़ना-उतरना सर्वथा असंभव है| जो सब जगह है, वह कहाँ से आयेगा और कहाँ जायेगा?


कमल- क्या रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि दुष्टों को मारने के लिये ईश्वर का अवतार नहीं हुआ? और क्या भविष्य में दुष्टों के दमन के लिए ईश्वर का अवतार नहीं होगा? मैंने सुना है कि जब-२  धर्म की हानि होती है, तब-२ अवतार होता है ।



विमल - ईश्वर का अवतार न कभी हुआ है, और न कभी होगा । समय-समय पर जो महान् पुरुष उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने दुष्टों का दमन किया है या जनता को ठीक रास्ता दिखलाया है, लोगों ने इन्हें तरह-२ की उपाधियाँ प्रदान की हैं । किसी ने उन महान् पुरुषों को 'नबी' माना, किसी ने ईश्वर का बेटा माना । किसी ने ईश्वर का अवतार माना, किसी ने उन्हें साक्षात् ईश्वर माना । परन्तु वे सब के सब थे मनुष्य ही जरा विचारों तो सही, जो ईश्वर बिना शरीर के शरीरधारी प्राणियों को उत्पन्न कर सकता है, क्या वह ईश्वर बगैर शरीर के शरीरधारी प्राणियों को मार नहीं सकता? आज भी संसार में असंख्य प्राणी पैदा हो रहे है, और मर रहे हैं । क्या ईश्वर शरीर धारण करके उनकी उत्पत्ति और विनाश कर रहा है? ईश्वर के एक ही भूकम्प से लाखो प्राणी मर जाते है । एक ही तूफान में नगर के नगर विध्वंस हो जाते है । एक ही प्लेग, महामारी, हैजा आदि रोग में लाखों मनुष्यों का संहार हो जाता है । भला यह क्या बात हुई कि तुच्छ प्राणियों को मारने के लिए ईश्वर अवतार लेता है उसके सामने रावण, कंसादि चीज ही क्या है? जो परमात्मा सृष्टि की उत्पत्ति प्रलय और स्थिति बिना शरीर के करता है, उसके लिये यह कहना कि दुष्टों को मारने के लिये अवतार लेता है सर्वथा हंसी और उसके घोर अपमान की बात है । 'जब-२ धर्म की हानि होती है तब-२ ईश्वर का अवतार होता हैं' यह कहना भी भूल से खाली नहीं । इसमें सन्हेद नहीं कि अवतार के मानने वाले प्राय: इसी बात को ज्यादा कहा करते हैं । लेकिन यह बात उन्ही के सिद्धान्त से खण्डित हो जाती है । देखो! अवतारवादी मुख्य दस अवतार मानते है और चार युग मानते है । सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग । 'सत युग' में चारो चरण धर्म के मानते है । 'त्रेता'  में तीन चरण धर्म के और एक चरण पाप का मानते है । 'द्वापर' में दो चरण धर्म के और दो चरण अधर्म के अर्थात् आधा पुण्य और आधा पाप मानते है । कलियुग ने तीन चरण पाप के और एक चरण पुण्य का मानते है । अब जरा अवतारों के क्रम पर विचार करो । सत्ययुग में चार अवतार मानते है, त्रेता में तीन और द्वापर में दो मानते है कलियुग में एक अवतार होना मानते है, जो निष्कलंक भगवान् के रुप से अन्त में प्रकट होगा । अब सोचने की बात यह है कि जब सतयुग में चारों चरण धर्म के है, अधर्म है ही नहीं तो चार अवतार किस प्रयोजन के लिये? त्रेता युग में जब धर्म के तीन चरण रहे, तो एक अवतार कम क्यों हो गया, तीन ही अवतार क्यों रहे? द्वापर में जब आधा पुण्य और आधा पाप रहा, तो अवतार दो ही क्यों रह गये? और कलियुग से जब एक ही चरण धर्म का रहा, तीन चरण अधर्म के हो गये तो अवतार एक ही क्यों रहा? और वह भी कलियुग के अन्त में जाकर क्यों होगा? होना तो यह चाहिए था अधर्म की वृद्धि के साथ-२ अवतारों की संख्या भी बढ़ती जाती, परन्तु हुआ यह कि ज्यों-ज्यों अधर्म संख्या में बढ़ता गया त्यों-त्यों अवतार कम होते गये । अब बताओ धर्म की हानि के साथ- २ अवतारों का सम्बन्ध क्या रह गया?



कमल - उन्होंने बड़े-२ चमत्कार दिखाये, जो मनुष्य नहीं दिखा सकता । जैसे गोवर्धन पहाड़ को ऊँगली पर उठाना आदि-२ | इससे मानना पड़ता है कि वे लोग ईश्वर के अवतार थे ।



विमल - प्रथम तो यह बात गलत है कि किसी ने ऊँगली पर पहाड़ उठाया । यदि दुर्जनतोष न्याय से इसे सही भी मान लें तो इसमें ईश्वर या ईश्वर के अवतार की कोई महत्ता प्रकट नहीं होती । तुम कहोगे क्यों? इसलिए कि जो ईश्वर सूर्य, नक्षत्र आदि ग्रहों और उपग्रहों को अपनी शक्ति से धारण किये हुये है उसके सामने गोवर्धन आदि पहाड़ राई के तुल्य भी तो नहीं हैं । जिस पृथ्वी पर हम तुम रहते है उस पर लाखो छोटे-बड़े पहाड़, उस पृथ्वी को ही परमात्मा ने धारण किया हुआ है तो गोवर्धन पहाड़ बेचारा है किस गिनती में यदि ईश्वर या ईश्वर का अवतार होकर किसी ने गोवर्धन पहाड़ उठा भी लिया तो इसमें कौन सी बहादुरी की बात हो गई? अगर एम० ए० के किसी विद्यार्थी ने दूसरी या तीसरी श्रेणी का कोई सवाल हल कर दिया तो क्या उसने कोई तीर मार दिया? हाँ दूसरी तीसरी श्रेणी का बालक होकर यदि एम० ए० का सवाल कर देता है तो वास्तव में उसकी प्रशंसा की बात है । इसी तरह मनुष्य होकर यदि किसी ने पहाड़ उठा लिया होता, तो वास्तव में एक चमत्कार की बात कहलाता, क्योकि मनुष्य से यह आशा न थी, जो उसने करके दिखा दिया लेकिन ईश्वर का अवतार होकर जब पहाड़ उठाया तो इसमें न कोई चमत्कार है, और न इसमें उसकी कोई महानता है ।



कमल - अगर तुम्हारे विचार से ईश्वर का अवतार नहीं होता, तो वह सर्वशक्तिमान् कैंसे माना जायेगा? जब ईश्वर होकर अवतार भी नहीं ले सकता, तो सर्वशक्तिमानपन रहा कहाँ ? सर्वशक्तिमान, तो वही है जो सब कुछ कर सकता हो ।


विमल - मित्र, तुमने विचार नहीँ किया, ईश्वर अवतार लेने से सर्वशक्तिमान् रहता ही नहीं, अल्प शक्तिमान हो जाता है । यदि कहो कैसे? सुनो, जो परमात्मा शरीर धारण करने से पहले बिना हाथों के कार्य कर रहा था, अब वह हाथों से कार्य करेगा । पहले बिना नेत्रों के देख रहा था, अब नेत्रो से देखेगा । पहले बिना कानों के सुन रहा था अब वह कानों से सुनेगा । तात्पर्य यह है अवतार लेने के पूर्व अपने सारे कार्य बिना शरीर के कर रहा था, अब शरीर का मुहताज बन के काम करेगा । जब दूसरे का मुहताज या अधीन बना तो सर्वशक्तिमान रहा कहाँ? जैसे अल्पज्ञ जीवात्मा अपने काम करने में शरीर का मुहताज है वैसे ही परमात्मा भी शरीर का मुहताज बन गया । फिर मनुष्य और ईश्वर में अन्तर ही क्या रहा? जैसे मनुष्य को भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी सताती है वैसे ही शरीरधारी परमात्मा को भी सतायेगी | जैसे राग-द्वेष ज्वर पीड़ा आदि मनुष्य में होते हैं, वैसे ही ईश्वर में भी होंगे सबसे बड़ा दोष तो यह है - ईश्वर अवतार लेते ही पराधीन हो जाता है, स्वाधीन रहता ही नहीं । कहीं उसे भोजन की आवश्यकता होती है, कहीँ जल की और कहीं वस्त्रो की । और कहीं रहने के स्थान की आवश्यकता होती है । समस्त काम अपनी शक्ति से करने वाला जब शरीर की सहायता से काम करने लगा, तो यह सर्वशक्तिमान माना ही कैसे जायेगा । यदि एक मनुष्य दूसरे को अपने नेत्रो की आकर्षण शक्ति से बेहोश कर देता है और दूसरा मनुष्य दवा खिलाकर बेहोश करता है, अब बताओं दोनों में ताकतवर कौन है । ताकतवर तो वह है, जो नेत्रों की शक्ति से बेहोश करता है । क्यों हैं इसलिए कि वह दूसरे को बेहोश करने में दवा का मुहताज नहीं । अब तुम अच्छी तरह समझ गए होंगे, ईश्वर सर्वशक्तिमान् तभी हो सकता है, जब अवतार धारण न करे । तुम्हारा जो यह विचार है कि सर्वशक्तिमान सब कुछ कर सकता है, सिवाय भ्रान्ति के और कुछ नहीं है। सर्वशक्तिमान शब्द का अर्थ तो यह है कि उसमें सर्वशक्तियाँ हैं । यह संसार के सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थ को मिला सकता है और पृथक कर सकता है । समस्त जीवों को कर्मानुसार फल दे सकता है, सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कर सकता है, और उसको नियम में चला सकता है । तात्पर्य यह है परमात्मा अपने काम करने में दूसरे का सहारा नहीं लेता यही ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता है । सर्वशक्तिमान का यह अर्थ कभी नहीं होता कि वह असम्भव को सम्भव कर सकता है ।


कमल - क्या ईश्वर असम्भव को सम्भव नहीं कर सकता? यदि नहीं कर सकता तो वह ईश्वर ही नहीं है ।


विमल - असम्भव को सम्भव न करना, नियम को अनियन न करना ही ईश्वर की ईश्वरता है। यदि तुम समझते हो, कि ईश्वर असम्भव को सम्भव कर सकता है तो मैं पूछता हूँ बताओ ईश्वर अपने को नष्ट कर सकता है या नहीं? ईश्वर अपने समान दूसरा ईश्वर बना सकता है, या नहीं?



कमल - ईश्वर अपने को चाहे नष्ट न करे, पर अपने समान दूसरा ईश्वर अवश्य बना सकता है जबकि वह सर्वशक्तिमान है ।



विमल - नहीं मित्र, ईश्वर अपने समान दूसरा ईश्वर नहीं बना सकता । तुम कहोगे क्यों? अच्छा सुनो, कल्पना करो आज ईश्वर ने दूसरा ईश्वर बना लिया है । अब विचारना यह है क्या बना हुआ ईश्वर, ईश्वर के समान हो गया? हर्गिज नहीं । तुम कहोगे क्यों नहीं हुआ? इसलिए नहीं हुआ कि एक ईश्वर तो पुराना रहा दूसरा नया रहा । एक अनादि रहा, दूसरा आदि रहा । दूसरे शब्दों में एक नया बना हुआ रहा दूसरा बेबना हुआ रहा । एक में आयु का सम्बन्ध नहीं क्योंकि वह नित्य है दूसरे की आयु आज से आरम्भ हुई, क्योंकि बनाया गया है । ईश्वर व्यापक रहा, बना हुआ ईश्वर व्याप्य रहा, क्योंकि दोनों व्यापक यों हो ही नहीं सकते । यदि कहो आधे--आधे व्यापक हो गये तो दोनो सर्वव्यापक न रहे । जब सर्वव्यापक न रहे तो दोनो ही ईश्वर न रहे । अत: सर्वशक्तिमान का यह अर्थ ही नहीं है कि ईश्वर सब कुछ कर सकता है । ईश्वर वही कर सकता है, जो ईश्वर को करना चाहिए ।



कमल - यदि ईश्वर का अवतार मान लें तो इसमें हानि क्या होती है?



विमल - यदि ईश्वर का अवतार होता ही नहीं, फिर उसको मान लेना सत्य का गला घोंटना है, यही एक बड़ी हानि है। दूसरी हानि यह है कि सारे संसार की उन्नति करने वाला परमात्मा अवनति को प्राप्त हो जाता है क्यों? इसलिए कि वह नारायण से नर बनता है! नर से नारायण बनना उन्नति का सूचक कहा भी जा सकता है, परन्तु नारायण से नर बनना तो सरासर अपने पद से नीचे गिरना है । कोई रंक यदि राजा हो जाता है तो वास्तव में उसकी उन्नति हुई है । परन्तु राजा से रंक हो जाने को उन्नति का चिन्ह कौन मानेगा, सिवाय भोलो के? तीसरी हानि यह है कि हर एक पाखण्डी अपने को ईश्वर का अवतार कहने लगता है और भोले - भाले स्त्री पुरुषों को अपने जाल में फंसाकर उनका धर्म-कर्म नष्ट कर देता है । उन्हें चेले और चेलियाँ बनाकर उनसे धन लेकर खूब मौजे उडाता है । भारतवर्ष में कई ऐसे पाखण्डियो के उदाहरण मौजूद हैं जिन्होंने अपने को अवतार घोषित किया और स्त्रियों तथा पुरुषों के धर्म और धन को खूब नष्ट किया । चौथी हानि अवतार को मानने से यह है कि लोग अत्याचार के सहने वाले हो जाते है । जब दुष्ट और पापी अत्याचार करते है, बहन-बेटियों की इज्जत खराब करके सम्पति लूट ले जाते हैं, मकानों और दुकानों में आग लगा देते हैं तो अवतारवादी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते है । वे अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार नहीं करते। वे सोचते हैं, अन्याय अधर्म का रोकना हमारे यश की बात नहीं है । जब भगवान अवतार धारण करेंगे, तभी दुष्टों का संहार होगा, तभी धर्म की स्थापना हो सकेगी, तभी पाप दूर होगा । और तभी पृथ्वी का भार हल्का होगा। वास्तव में यह एक महान् कायरता है, जो ईश्वर का अवतार मानने के कारण ही लोगो में उत्पन्न हुई है । जिन जातियों में ईश्वर का अवतार नहीं माना जाता वे जातियों अपने दुश्मनों से स्वयं कसकर बदला लेती हैं । वे कभी नहीं सोचती कि अन्यायी और अत्याचारियों को मारने के लिये ईश्वर का अवतार होगा । वे समझती है, जैसे हाथ पाँव भगवान् ने इन अत्याचारियों को दिये है वैसे ही हमें भी दिये हैं, इसलिये वे जातियों दुश्मन से डटकर मुकाबला करती है। वे अपना करने का काम ईश्वर पर नहीं छोड़ती । मित्र कमल, मै तुमसे सत्य कहता हूँ इस अवतार के सिद्धातों ने आर्य जाति को बहुत पतित और पद-दलित किया है । इसने आत्मविश्वास को जाति से सर्वथा निर्वासित कर दिया है ।



कमल - मित्र, तुम्हारी युक्तियों का प्रभाव तो मुझ पर बहुत पड़ा है, अब यह बताओं कि जब ईश्वर निराकार है तो हम उसका ध्यान कैंसे करें?



विमल - परमात्मा की कृपा है जो तुम्हारे ऊपर सत्य सिद्धान्त का प्रभाव पड़ा है । जो प्रश्न अब तुमने किया है इस पर विचार कल किया जाएगा |


| ओ३म् |

No comments:

Post a Comment