Wednesday, December 7, 2011

ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना मंत्र


ईश्वर स्तुति  प्रार्थना  उपासना मंत्र

ओ३म् भूर्भुव: स्व: | तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो न: प्रचोदयात् || यजुर्वेद ३६.३

 
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू |
तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ||
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान |

सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ||
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया |

ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला || 


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ओ३म विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव| यद भद्रं तन्न आ सुव || यजुर्वेद ३०.३

तू सर्वेश सकल सुखदाता शुध्दस्वरूप विधाता है|
उसके कष्ट नष्ट हो जाते जो तेरे ढिंग आता है||
सारे दुर्गुण दुर्व्यसनो से हमको नाथ बचा लीजिये|
मंगलमय गुणकर्म पदार्थ प्रेम सिन्धु हमको दीजिए ||

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हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत | स दाधार प्रथिवीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम || यजुर्वेद १३.४

तू ही स्वयं प्रकाश सुचेतन सुखस्वरूप शुभ त्राता है|
सूर्य चन्द्र लोकादि को तू रचता और टिकाता है||
पहले था अब भी तूही है घट घट मे व्यापक स्वामी|
योग भक्ति तप द्वारा तुझको पावें हम अन्तर्यामी ||       

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य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवा: । यस्य छायाऽमृतं यस्य मृत्यु: कस्मै देवाय हविषा विधेम || यजुर्वेद २५.१३
तू ही आत्म ज्ञान बल दाता सुयश विज्ञ जन गाते है |
तेरी चरण शरण मे आकर भव सागर तर जाते है ||
तुझको ही जपना जीवन है मरण तुझे बिसराने मे |
मेरी सारी शक्ति लगे प्रभू तुझसे लगन लगाने में ||     

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य: प्राणतो निमिषतो महित्वैक इन्द्राजा जगतो बभूव। य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेम ||  यजुर्वेद २३.३

तुने अपने अनुपम माया से जग मे ज्योति जगायी है |
मनुज और पशुओ को रच कर निज महिमा प्रघटाई है ||
अपने हृदय सिंहासन पर श्रद्धा से तुझे बिठाते है |
भक्ति भाव की भेंटे ले के तब चरणो मे आते है || 
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येन द्यौरुग्रा पृथिवी च द्रढा येन स्व: स्तभितं येन नाक: । यो अन्तरिक्षे रजसो विमान: कस्मै देवाय हविषा विधेम || यजुर्वेद ३२.६
तारे रवि चन्द्रादि रच कर निज प्रकाश चमकाया है |
धरणी को धारण कर तूने कौशल अलख लखाया है ||
तू ही विश्व विधाता पोषक, तेरा ही हम ध्यान धरे |
शुद्ध भाव से भगवन तेरे भजनाम्रत का पान करे ||

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प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तनो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् || ऋ्गवेद १०.१२१.१०

तुझसे भिन्न न कोई जग मे, सबमे तू ही समाया है |
जङ चेतन सब तेरी रचना, तुझमे आश्रय पाया है ||
हे सर्वोपरि विभव विश्व का तूने साज सजाया है |
हेतु रहित अनुराग दीजिए यही भक्त को भाया है ||  
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स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र देवा अमृतमानशाना स्तृतीये घामन्नध्यैरयन्त || यजुर्वेद ३२.१०

तू गुरु है प्रदेश ऋतु है, पाप पुण्य फल दाता है |
तू ही सखा मम बंधु तू ही तुझसे ही सब नाता है ||
भक्तो को इस भव बन्धन से तू ही मुक्त कराता है |
तू है अज अद्वैत महाप्रभु सर्वकाल का ज्ञाता है ||
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अग्ने नय सुपथा राय अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेँम || यजुर्वेद ४०.१६

तू है स्वयं प्रकाशरुप प्रभु सबका स्रजनहार तू ही |
रचना नित दिन रटे तुम्ही को मन मे बसना सदा तूही ||
अग अनर्थ से हमें बचाते रहना हर दम दयानिधान |
अपने भक्त जनो को भगवन दीजिए यही विशद वरदान ||     

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